कोई आता है रोज़ मेरी गलियों मे..

कोई आता है रोज़,
मेरी गलियों मे.
कुछ ढूंढता है,
चला जाता है.
फ़िर से आता है वो,
अपने आने का अहसास कराने.
क्या ढूंढता है,
बस वही जानता है.
क्यों ढूंढता है,
बस वही जानता है.
मैं मौन देखता रहता हूँ,
उसके आने और जाने को.
महसूस करता हूँ,
उसके ढूँढने की कोशिशों को.
क्या कुछ मेरा सामान,
रह गया है उसके पास.
देने आता हो,
पर दे नही पाता हो.
सोचता हूँ …
कभी वो कुछ पूछे मुझसे,
कभी कुछ बात करे.
कभी तो बताए मुझे,
उसके आने का सबब.
माँग ले वो मुझसे ही,
जो ढूँढ रहा है.
या देदे मुझे ही,
जो वो देने आया है.
क्या रोकता है,
मुझसे बात करने में.
अगर मैं कुछ भी नही,
तो क्यों आता है गलियों मे.
बुलाता हूँ मैं ..
मत आओ यूँ छुप-छुप के,
सब के सामने आ जाओ.
रहे होने शिकवे गीले कभी,
जमाने बीत गये उन बातों को.
निकल के उस दुनिया से,
कभी मेरी दुनिया मे जाओ.
अहसास तो करा देते हो आने का,
कभी सच मे भी आ जाओ.
बैठेंगे कुछ बातें करेंगे,
थोड़ी देर साथ दे देना.
जो तुमको देना है तुम दे देना.
जो मुझसे लेना है वो ले लेना.

एक प्रयास

वादा देकर निभाया शिद्दत से ,
फिर भी गये वो साथ छोड़ कर.
 
शायद वो फिर से आ जाएँ,
देख रहे हम वादा तोड़ कर.
 
दबाई थी कविताओं की पंक्तियाँ जहाँ,
ढूँढ रहें है आज वहीं पर धरती खोद कर.
 
किस्मत ने बदलीं जो राहें कहीं,
आओ देखें उन्हे फिर से कहीं जोड़ कर.
 
कर रहे हैं इंतज़ार आज भी वहीं,
बिछड़े थे कल हम जिस मोड़ पर.
 

कितना मुश्किल होता है किसी को समझना

कितना मुश्किल होता है किसी को समझना,
जब कोई बोलता ही नही है,
छुपा लेता है, अपनी भावनाओं को,
दबा लेता है, अपने अहसासों को.

कितना मुश्किल होता है किसी को समझना,
जो सुनता तो सब कुछ है,
पर अनसुना कर देता है सवालों को,
या टाल देता है उनके उलझे जवाबों को.

कितना मुश्किल होता है किसी को समझना,
जो समझता तो है अहसासों को,
सवारता भी है उनको शिद्दत से,
पर उनको जीने से डरता भी है.

कितना मुश्किल होता है किसी को समझना,
जो चाहता है साथ रहना,
पर बुलाता नही पास अपने,
और दूरियों को बनाए रखता है.

कितना मुश्किल होता है किसी को समझना.

वो अनजानी गलियाँ

वो अनजानी सी गलियाँ

जिंदगी के किसी कोने मे छुपी हुई.

गलियाँ दिखाई तो देती है

पर उनका तिलिस्म उनको अनजान बना कर रखता है

कोई पर्दा ढंके रहता है राज़ को

और झलक दिखा कर उत्सुकता भी बड़ा देता है

कोई बुलाता है उस तिलिस्म को दिखाने के लिये

फिर खुद ही ढांक देता है , किसी डर से

हम भी उन गालियों मे झाँकते है

कुछ देखते है कुछ जानते है

कुछ सोचते है कुछ मानते है

पर फिर वहीं रुक जाते है

इंतजार करते है तिलिस्म के टूटने का

वही तिलिस्म, जो खुद भी एक तिलिस्म मे बंधा है

जो एक डर से बांधे हुए है कई डर

पर फिर भी उन्हे किसी को दिखाना है

अंधेरे से उजालों मे लाना है

एक सुन्दर सा दुनिया को कोना

जो अंजाना है सबके लिये

किसी के लिये वो सारा जहां है

उस जहां मे किसी और को बसाने के लिये

टूटना ही होगा उस तिलिस्म को

बिखरना ही होगा उस डर को

कोई और नही कर सकता यह क़रिश्मा

सिर्फ तुम्हे ही करना होगा

सिफ तुम्हे ही लड़ना होगा , अपने आप से.