वो अनजानी गलियाँ

वो अनजानी सी गलियाँ

जिंदगी के किसी कोने मे छुपी हुई.

गलियाँ दिखाई तो देती है

पर उनका तिलिस्म उनको अनजान बना कर रखता है

कोई पर्दा ढंके रहता है राज़ को

और झलक दिखा कर उत्सुकता भी बड़ा देता है

कोई बुलाता है उस तिलिस्म को दिखाने के लिये

फिर खुद ही ढांक देता है , किसी डर से

हम भी उन गालियों मे झाँकते है

कुछ देखते है कुछ जानते है

कुछ सोचते है कुछ मानते है

पर फिर वहीं रुक जाते है

इंतजार करते है तिलिस्म के टूटने का

वही तिलिस्म, जो खुद भी एक तिलिस्म मे बंधा है

जो एक डर से बांधे हुए है कई डर

पर फिर भी उन्हे किसी को दिखाना है

अंधेरे से उजालों मे लाना है

एक सुन्दर सा दुनिया को कोना

जो अंजाना है सबके लिये

किसी के लिये वो सारा जहां है

उस जहां मे किसी और को बसाने के लिये

टूटना ही होगा उस तिलिस्म को

बिखरना ही होगा उस डर को

कोई और नही कर सकता यह क़रिश्मा

सिर्फ तुम्हे ही करना होगा

सिफ तुम्हे ही लड़ना होगा , अपने आप से.

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