कभी सुबह का
कभी शाम का
कभी उजियारे का
कभी अँधियारे का
कभी हँसी का
कभी खुशी का
कभी बात का
कभी साथ का
कभी उनके आने का
कभी साथ जाने का
कभी पाने का
कभी अपनाने का
कभी प्यार का
कभी इकरार का
इंतज़ार ही इंतज़ार
कभी ना ख़त्म होता
इंतज़ार यह इंतज़ार
कभी सुबह का
कभी शाम का
कभी उजियारे का
कभी अँधियारे का
कभी हँसी का
कभी खुशी का
कभी बात का
कभी साथ का
कभी उनके आने का
कभी साथ जाने का
कभी पाने का
कभी अपनाने का
कभी प्यार का
कभी इकरार का
इंतज़ार ही इंतज़ार
कभी ना ख़त्म होता
इंतज़ार यह इंतज़ार
मैं पूरी कोशिश कर रहा था
उसका पहचान ढूँढने की
उसका चेहरा ढूँढने की
चेहरा तो उसका था ही नही
इसलये उसकी आँखों को ही देख रहा था
आँखो और हरकतों से ही
उसका चेहरा गढ़ने की कोशिश कर रहा था
चेहरा धीरे धीरे बनने लगा
और फिर पूरा बन भी गया
जब चेहरे को ध्यान से देखा
कुछ जाना पहचाना सा लगा
यह वही चेहरा था
जो मैं रोज देखता हूँ
आईने में
हाँ .. मेरा ही चेहरा
नज़र आया मुझे जोकर मे
अब मैं पा रहा था
खड़ा हुआ अपने आप को सर्कस में
देख रहा था सब तरफ़
कोशिश कर रहा था पढ़ने की
कौन हंस रहा है
मेरी झूठी मुस्कान देख कर
कौन हंस रहा है
मेरी बेवकूफ़ना हरकतों पर
कौन हंस रहा है
मेरे चिढ़ने पर
कौन हँस रहा है
मेरे दर्द पर
मेरा चेहरा मुस्कुरा रहा था
आँखें भर आई थी
मैं नही ढूँढ पाया
कोई चेहरा
जो पढ़ रहा हो मेरी आँखों को
जो सोच रहा हो मेरे बारे मे
जो याद रखेगा मुझे कल भी
जो पहचानेगा मुझे भी
जितना पोंछता रहा आँखो को
उतनी ही धुंधली होती गयी
अब तो पास के चेहरे भी
नही पढ़ पा रहा था मैं.
अब मैं खड़ा हूँ
वहीं पर रिंग मे
कोई तो होगा जो सोचेगा मेरे बारे मे
और हाथ पकड़ के ले जाएगा साथ मे
जोकर के चेहरे की ज़रूरत तो सबको होती है
किसी को भी तो मेरे चेहरे की ज़रूरत होगी
मगर मैं तो यह भी नही जानता
क्या कोई पसंद भी करेगा
मेरे इस छुपे हुए चेहरे को
या जानकर असली चेहरा
मेरे ऊपर फिर कोई मुखौटा लगा देगा
शायद मेरी दुनिया भी यही रिंग है
रिंग को मेरी ज़रूरत हो या ना हो
मेरी पहचान यही रिंग है
और जोकर ही मेरा चेहरा है.
जानते हुए अपनी असलियत को
फिर भी कभी कभी
ज़िद कर बैठता हूँ
आइस्क्रीम खाने की
माँग बैठता हूँ
एक क़तरा
उम्मीद रखता हूँ
कुछ पाने की
कोई हँसता है मेरी इस ग़लती पर
कोई मना कर के चला जाता है
कोई झूठा वादा कर के
पीछा छुड़ा कर चला जाता है
और मैं सच मान कर
बैठा रहता हूँ इंतजार में
जब तक की कोई मुझे
आईना दिखा नही देता
मेरी असलियत याद दिला नही देता
मैं फिर चल देता हूँ
अपनी रिंग मे
फिर वही मुस्कान लिए
पर अब मैं भी नही जानता
की मुस्कान असली है या दर्द
हर सुबह एक नयी मुस्कान ले के आए,
इन गुलाबी होठों पे.
एक नयी चमक जगाए,
इन गहरी आँखो मे.
नयी ताज़गी भरे,
हर अंगड़ाईयों मे
और आत्मविश्वास का सागर भरे,
मन की गहराइयों मे.