विदाई
सोचा था एक मीठी सी कविता
भेंट करूँ इस विदाई में .
मेरी आखिरी कविता मीठी हो, सपनो की एक वीथी हो,
ना लम्बी हो ना छोटी हो ,कुछ ख्वाहिशों की पोथी हो.
पर अब मैं जब लिखने बैठा हूँ , विचार ठहर नहीं पाते है ,
टूटे दिल की ही तरह से, पल-पल में टूटते जाते है..
उदास मन के झरोखे में , ठंडी सी हवा कुछ आती है ,
तड़पते अरमानों को, को कुछ और तड़पा जाती है .
उसे वेदना कैसे कहूं , जो मुझको बहूत ही प्यारा है,
पर मीठा भी कैसे लिखूं जब दिल ही खारा खारा है .
प्रेरणा जो मन में थी, उम्मीदों के साथ ही चली गयी ,
अब और कविता लिखने की , इच्छा भी कहीं बची नहीं.
कुछा पगला सा , नालायक सा , पहचान मेरी ये याद रहे,
आपके दीवानों की दुनिया में , मेरा नाम कही आबाद रहे.
कभी जिंदगी में फिर याद करो , आशा यही करता हूँ,
आखिर कुछ पंक्तियाँ है , भेंट यही बस करता हूँ.