Author: Rupesh Kanojia
चार दिन की चाँदनी
कोई आता है रोज़ मेरी गलियों मे..
एक प्रयास
कितना मुश्किल होता है किसी को समझना
कितना मुश्किल होता है किसी को समझना,
जब कोई बोलता ही नही है,
छुपा लेता है, अपनी भावनाओं को,
दबा लेता है, अपने अहसासों को.
कितना मुश्किल होता है किसी को समझना,
जो सुनता तो सब कुछ है,
पर अनसुना कर देता है सवालों को,
या टाल देता है उनके उलझे जवाबों को.
कितना मुश्किल होता है किसी को समझना,
जो समझता तो है अहसासों को,
सवारता भी है उनको शिद्दत से,
पर उनको जीने से डरता भी है.
कितना मुश्किल होता है किसी को समझना,
जो चाहता है साथ रहना,
पर बुलाता नही पास अपने,
और दूरियों को बनाए रखता है.
कितना मुश्किल होता है किसी को समझना.
वो अनजानी गलियाँ
वो अनजानी सी गलियाँ
जिंदगी के किसी कोने मे छुपी हुई.
गलियाँ दिखाई तो देती है
पर उनका तिलिस्म उनको अनजान बना कर रखता है
कोई पर्दा ढंके रहता है राज़ को
और झलक दिखा कर उत्सुकता भी बड़ा देता है
कोई बुलाता है उस तिलिस्म को दिखाने के लिये
फिर खुद ही ढांक देता है , किसी डर से
हम भी उन गालियों मे झाँकते है
कुछ देखते है कुछ जानते है
कुछ सोचते है कुछ मानते है
पर फिर वहीं रुक जाते है
इंतजार करते है तिलिस्म के टूटने का
वही तिलिस्म, जो खुद भी एक तिलिस्म मे बंधा है
जो एक डर से बांधे हुए है कई डर
पर फिर भी उन्हे किसी को दिखाना है
अंधेरे से उजालों मे लाना है
एक सुन्दर सा दुनिया को कोना
जो अंजाना है सबके लिये
किसी के लिये वो सारा जहां है
उस जहां मे किसी और को बसाने के लिये
टूटना ही होगा उस तिलिस्म को
बिखरना ही होगा उस डर को
कोई और नही कर सकता यह क़रिश्मा
सिर्फ तुम्हे ही करना होगा
सिफ तुम्हे ही लड़ना होगा , अपने आप से.
फ़ासले
कोई तो रोक ले ..
हॊली
अग्नि के शॊलॊं से बचना
बुराई का दहकना
होलिका का जलना
कृष्ण और गोपीयॊं का प्यार
गुलाल और रंगॊं की फुहार
अपनों का मिलन
दुश्मनी का दहन
त्योहर की उमंग
मस्ती की तरंग