मुखौटे

हर चेहरे पे मुखौटे है
हर मुखौटे की अपनी पहचान है
कोई रावण का चेहरा है
तो किसी मे छुपे भगवान है
 
मेरे भी चेहरे पर
कई मुखौटे लगे हुए है
फिर भी छुप नही पाया
मेरा असली चेहरा कहीं
 
मेरा चेहरा
अब नज़रों को धोखा बन गया है
देखने वालो को
अपनी भावनाओं का  ही अक्स नज़र आता है
 
मैं खुद भी
तलाश रहा था अपना चेहरा
आईने  में भी मुझे
सिर्फ़ मुखौटे ही नज़र आते थे
 
फिर किसी दिन
कोई देखता है मुझे
अपने सुंदर
दिल की नज़र से
 
और ढूँढ ही लेता है
मेरे असली चेहरे को
और दिखाता है मुझे
मेरा वही चेहरा
 
सतरंगी मुखौटों  मे दबा हुआ
मेरा चेहरा अभी भी रंगा नही है
उतना सुंदर  तो नही
पर फिर भी बुरा नही है
 
अब मैं भी
उतारता जा रहा हूँ
उन मुखौटों को
और ले रहा हूँ खुल के साँस
 
किसी ने मुझे
खुद को जीना सीखा दिया
अपने ही मुखौटों से
लड़ना सीखा दिया
 
अभी भी
कुछ मुखौटे मेरे साथ है
पर देख सकता है सिर्फ़ वही
मेरा साधारण चेहरा
मेरा असली चेहरा
 

साथ – साथ

ख्वाहिशों के जॅंगल मे
हर दरख़्त एक मंज़िल होता है
और हर रास्ता भी
मंज़िलों से घिरा होता है
 
हम ख्वाब चुनते है
ख्वाहिशों के संग बुनते है
मंज़िलें पिरोते है
रास्ते तराशते है
 
नयी ख्वाहिशें
नयी राह बनती है
और हर नयी राह
पुराने राहों से दूर ले जाती है
 
कुछ राहों मे
हम अकेले होते है
कुछ राहों मे
कोई साथ होता है
 
कोई होता है
जिसे हम हर राह मे चाहते है
कोई होता है
जो हर राह मे हमारे साथ होता है
 
कभी रास्ते पीछे छूट जाते है
कभी साथ  बदल जाते है
हमें ही चुनना होता है
रास्ता बदले या साथ
 
हम चाहते है
कुछ नयी मंज़िलों को
पर बँधे भी होते है
कुछ पुराने रिश्तों से
 
छोड़ नही पाते उन्हे
कुछ पल के लिए भी
और निभा भी नही पाते
नये रिश्तों को
 
हर मोड़ पे
जाने अंजाने
कुछ खोते है
कुछ पाते है
 
हम भूल जाते है
कभी पाने को
कभी भूल जाते है
खोने को
 
नये रास्तों से ज़्यादा
कठिन होता है
पुराने रिश्तों को
हमसे दूर करना
 
हमारे रास्ते
उलझ जाते हैं
और फिर हम भटकते रह जाते हैं
उन्ही ख्वाहिशों के जंगल में
 
हमें ही ढूँढना होता है
नये रास्ते को
चुनना होता है
खोने और पाने को
 
और तभी हम पाते हैं
नयी मंज़िलों को
नये ख्वाबों को
और नये अरमानो को

चार दिन की चाँदनी

सुनते आ रहे है
चार दिन की होती है चाँदनी,
उसके बाद फिर से
अंधेरा होता है.
चाँदनी एक अहसास है
चाँद के साथ होने का,
जो चार दिन का नही
युगों युगों का होता है.
इसी चाँदनी के साथ
अमृत भी बरसता है,
जो ज़िंदगी को ही
चाँदनी से भर देता है.
सोचो मत ज़्यादा अब
अँधियारे के बारे मे,
फैला कर अपनी बाँहें
भर लो अमृत प्याले में.
यही अमृत हमेशा साथ रहेगा
अंधेरों को भी उज्ज्वल रोशन कर देगा.
दूर नही जाने देगा चाँद को
अँधियारे को ही चार दिन मे जला देगा.

 

कोई आता है रोज़ मेरी गलियों मे..

कोई आता है रोज़,
मेरी गलियों मे.
कुछ ढूंढता है,
चला जाता है.
फ़िर से आता है वो,
अपने आने का अहसास कराने.
क्या ढूंढता है,
बस वही जानता है.
क्यों ढूंढता है,
बस वही जानता है.
मैं मौन देखता रहता हूँ,
उसके आने और जाने को.
महसूस करता हूँ,
उसके ढूँढने की कोशिशों को.
क्या कुछ मेरा सामान,
रह गया है उसके पास.
देने आता हो,
पर दे नही पाता हो.
सोचता हूँ …
कभी वो कुछ पूछे मुझसे,
कभी कुछ बात करे.
कभी तो बताए मुझे,
उसके आने का सबब.
माँग ले वो मुझसे ही,
जो ढूँढ रहा है.
या देदे मुझे ही,
जो वो देने आया है.
क्या रोकता है,
मुझसे बात करने में.
अगर मैं कुछ भी नही,
तो क्यों आता है गलियों मे.
बुलाता हूँ मैं ..
मत आओ यूँ छुप-छुप के,
सब के सामने आ जाओ.
रहे होने शिकवे गीले कभी,
जमाने बीत गये उन बातों को.
निकल के उस दुनिया से,
कभी मेरी दुनिया मे जाओ.
अहसास तो करा देते हो आने का,
कभी सच मे भी आ जाओ.
बैठेंगे कुछ बातें करेंगे,
थोड़ी देर साथ दे देना.
जो तुमको देना है तुम दे देना.
जो मुझसे लेना है वो ले लेना.

एक प्रयास

वादा देकर निभाया शिद्दत से ,
फिर भी गये वो साथ छोड़ कर.
 
शायद वो फिर से आ जाएँ,
देख रहे हम वादा तोड़ कर.
 
दबाई थी कविताओं की पंक्तियाँ जहाँ,
ढूँढ रहें है आज वहीं पर धरती खोद कर.
 
किस्मत ने बदलीं जो राहें कहीं,
आओ देखें उन्हे फिर से कहीं जोड़ कर.
 
कर रहे हैं इंतज़ार आज भी वहीं,
बिछड़े थे कल हम जिस मोड़ पर.
 

कितना मुश्किल होता है किसी को समझना

कितना मुश्किल होता है किसी को समझना,
जब कोई बोलता ही नही है,
छुपा लेता है, अपनी भावनाओं को,
दबा लेता है, अपने अहसासों को.

कितना मुश्किल होता है किसी को समझना,
जो सुनता तो सब कुछ है,
पर अनसुना कर देता है सवालों को,
या टाल देता है उनके उलझे जवाबों को.

कितना मुश्किल होता है किसी को समझना,
जो समझता तो है अहसासों को,
सवारता भी है उनको शिद्दत से,
पर उनको जीने से डरता भी है.

कितना मुश्किल होता है किसी को समझना,
जो चाहता है साथ रहना,
पर बुलाता नही पास अपने,
और दूरियों को बनाए रखता है.

कितना मुश्किल होता है किसी को समझना.

वो अनजानी गलियाँ

वो अनजानी सी गलियाँ

जिंदगी के किसी कोने मे छुपी हुई.

गलियाँ दिखाई तो देती है

पर उनका तिलिस्म उनको अनजान बना कर रखता है

कोई पर्दा ढंके रहता है राज़ को

और झलक दिखा कर उत्सुकता भी बड़ा देता है

कोई बुलाता है उस तिलिस्म को दिखाने के लिये

फिर खुद ही ढांक देता है , किसी डर से

हम भी उन गालियों मे झाँकते है

कुछ देखते है कुछ जानते है

कुछ सोचते है कुछ मानते है

पर फिर वहीं रुक जाते है

इंतजार करते है तिलिस्म के टूटने का

वही तिलिस्म, जो खुद भी एक तिलिस्म मे बंधा है

जो एक डर से बांधे हुए है कई डर

पर फिर भी उन्हे किसी को दिखाना है

अंधेरे से उजालों मे लाना है

एक सुन्दर सा दुनिया को कोना

जो अंजाना है सबके लिये

किसी के लिये वो सारा जहां है

उस जहां मे किसी और को बसाने के लिये

टूटना ही होगा उस तिलिस्म को

बिखरना ही होगा उस डर को

कोई और नही कर सकता यह क़रिश्मा

सिर्फ तुम्हे ही करना होगा

सिफ तुम्हे ही लड़ना होगा , अपने आप से.

फ़ासले

वक्त बदलता जाता है ,
फ़ासले बदलते जाते है . 
कभी होते है मीलों दूर ,
कभी साँसों में बस जाते है ,
कभी चलते है साथ साथ
कभी भरोसे नहीं बन पाते है .
कभी वादे  साथ चलने के ,
कभी  दूरियों के बहाने ढूंढें जाते है .
कभी खो जाते है बाँहों में ,
कभी पास भी नहीं आते है .
वक़्त खेलता है साथ हमारे
या वो हमें आजमाते है .

कोई तो रोक ले ..

एक बार फिर से
मैं उसी जगह पे खड़ा हूँ,
कोई जा रहा है ..
मुझे छोड़ कर
चाहता हूँ मैं,
उसके साथ रहना
चाहता हूँ मैं
उसे दिल भर के देखना
मैं कर नही पा रहा
कुछ भी
सिर्फ़ देख रहा हूँ
उसको जाते हुए
मैं बँधा हुआ हूँ,
अपने ही वादों मे.
झूठ बोल नही सकता,
सच सह नही सकता.
क्यों  जा रहे हो
मत जाओ ना.
मैं नही रोक सकता
कोई और तो रोक ले
हवाओं तुम रोक लो
पानी तुम रोक लो
धरती तुम रोक लो
आसमान तुम रोक लो
तारे तुम रोक लो
चाँद तुम रोक लो
कोई तो रोक ले ..
भगवान तो मेरी सुनता नही है,
जो माँगो वो छीनता ज़रूर है.
भगवान तुम्हारी सुनता है,
तुम ही बोलो ना ..
पर कोई तो रोक ले …
कोई तो रोक ले .

हॊली

प्रहळाद का हरिनाम जपना
अग्नि के शॊलॊं से बचना

बुराई का दहकना
होलिका का जलना

कृष्ण और गोपीयॊं का प्यार
गुलाल और रंगॊं की फुहार

अपनों का मिलन
दुश्मनी का दहन

त्योहर की उमंग
मस्ती की तरंग